एकांतिक वार्तालाप/12-03-2023/Ekantik Vartalaap/ Bhajan Marg

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Bhajan Marg संतोष अग्निहोत्री जी लंदन से राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव आपके चरणो में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव लंदन से पहले साल में एक बार आना होता था। आपकी कृपा से बहुत जल्दी आने को मिला है और यहां कुट्टी क्या भी व्यवस्था हो गई है। गुरुदेव प्रतिकूल परिस्थिति बहुत आ रही है। सहन शक्ति कैसे बढ़ाएं। कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता।

ऐसी कोई प्रतिकूल परिस्थिति ने जिसे हम सह ना सके। बातें होती के महत्वपूर्ण ही जहां होती वही सहा जाता है। कोई ऐसी प्रति प्रेम में इतनी सामर्थ होती है कि प्रतिकूलता सब भूल गए की तरह हो जाती है। देखो सांसारिक

प्यार 20 साल लड़की अपने माता-⁠पिता के द्वारा पोषित होकर कितने प्यार से पाली जाती है? उसको किसी बच्चे से प्रेम हो जाता है न माता न पीता न धर्म, न कुल नंबर, याद आना, रोकना, लज्जा और ना प्राणों की परवाह। वह कल लड़का क्या करेगा। जाकर यह

तो हम तो सच्चा प्यार के मार्ग में चले। प्रिया प्रीतम के फिर हमें कोई प्रतिकूलता दो हम डर जाए झुक जाए। इसका मतलब अभी प्रतिकूलता तो हमारे लिए फूलों का हार है। दुख तो हमारा साथी है। इस मार्ग में हर दुख सहेंगे पर अपने प्यारे से विमुख नहीं हो सकते। सभी स्मारके में चला जाता है। 

हां, मैं बहुत पहले कई बार सत्संग में कह चुके बहुत पहले वह गाना सुना था। उसके दो लाइने हमने लिखा कर रखी थी। अपने सामने हर गम तुम्हारा सहेंगे। खुशी से कभी भी न शिकवा करेंगे। किसी चाहे जितना दुख दो प्यारे। 

उस दुख को मैं मुस्कुरा कर सोऊंगा। कभी से किसी से शिकायत नहीं करूंगा क्योंकि अब मेरा जीवन आपके लिए है। आप किससे शिकायत करें। दिल देकर दिलबर से क्या बातें करें, वह तो हमारे दिल के स्वामी वो खुद जाने क्या होना है। क्या 

प्रतिकूलता तो हमारे लिए उन्नति का लक्षण है। दुख हमारा सगा भाई की तरह सुख देने वाला है। परेशानी की अनुकूलता गिराने वाली काई है। सुख हंसाने वाला दुश्मन है जो मैं प्रभु से विमुख कर देगा। ऐसे दुश्मन और कई को हम क्यों चाहे हम तो प्रतिकूलता और दुख को चाहेंगे जो भगवान की तरफ बड़ा 

करने की तो कोई बात ही नहीं है। हां मस्त और श्यामा श्याम को ही। व्यक्ति तो है नहीं कि पता नहीं हमारी बात पर जानते हो कि ना जानते हो तो सबके हृदय में बैठे हैं। सब की बातें जान रहे हैं। सच्चाई से उनसे अपनापन करोगे। 

हर प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल देंगे। हर प्रतिकूलता कोई भी प्रतिकूलता ऐसी नहीं है। देखो सबसे बड़ी प्रतिकूलता शरीर में कोई रोग हो जाना होता है। किडनी खराब है। दोनों कितनी भारी प्रतिकूलता है, डायलिसिस होता है 

जैसे तुम्हारी मर्जी प्रभु बराबर ऐसा नहीं कि हम लेट जा जाकर दिनचर्या चल रही बराबरी की मृत्यु को स्वीकार कर लिया। इससे बड़ा दुख क्या होता है। जिस दिन भी गलत में बिल्कुल चैन लगी है। आप बोलो बस छोड़ो पर्पल 

बस यही करने के लिए तो बृंदावन आए हैं। यही करने के लिए तुम प्रभु का भजन करते के प्राण छुट्टी और भगवान मिल जाए। प्रभु मिल जाए सबसे तेज रो रो के सहते। इसी के साथ हैं अपने लोग मुस्कुरा कर सहते हैं। प्यारे के द्वारा दिया हुआ हर विधान हमारे लिए उपहार है। मंगल है, हमारे लिए लाभ है और हम लाभ है, 

दूसरों को लगता होगा। बड़ा दुखद बात है, लेकिन वह हमारी छाती जानती है कि हमें क्या लाभ दिया। इस किडनी में हाथ साधना का हंकार मेरा कभी नष्ट नहीं होता। तुम लोग इस बात को नहीं जानते हो। बचपन से डिस्टिक ब्रह्म 471 अहंकार सूक्ष्मता 

महाराज किस किडनी के रोग ने बिटिया बैठ कर दिया। उस आफ भरोसो दरिंग चंदन के आती है। बाल ब्रह्मचारी आस्था के भजन कर राम बिटिया बैठ कर दिया। बैठने लायक नहीं रही। बोलने लायक नहीं। अगर बोल रहे बैठे थे तो उनकी कृपा से बोल दे। इसमें डॉक्टर ने तो मना किया है। 

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